उर्दू ग़ज़ल के शहंशाह डॉ. बशीर बद्र (91) नहीं रहे। उन्होंने गुरुवार दोपहर 12:15 बजे भोपाल में फानी दुनिया को अलविदा कहा। उर्दू अदब की रूह में समाए बशीर बद्र तक़रीबन 14 बरस डिमेंशिया की गिरफ़्त में रहे, जिससे उनकी याददाश्त कमजोर होती चली गई, मगर उनके शेर आज भी दिलों में धड़कते हैं। उनको शाम 7:30 बजे भोपाल टॉकीज के पास कब्रिस्तान में सुपुर्दे खाक किया गया। उनकी पत्नी, डॉ. राहत बद्र, जब उनके शेर गुनगुनातीं, तो बशीर साहब के चेहरे पर शादाबी की हल्की सी झलक उभर आती थी। कभी-कभी वे ख़ुद भी मिसरा पूरा करने लगते। एक वक़्त था, जब उनके बिना मुशायरे अधूरे माने जाते थे। उनकी मौजूदगी महफ़िल की कामयाबी की ज़मानत हुआ करती थी। जब भी उन्हें मुशायरे की याद आती थी तो इरशाद, इरशाद कहने लगते थे। ग़ज़ल जागती रही, मैं सो गया- अशोक मिज़ाज बद्र सागर के शायर अशोक मिज़ाज बद्र ने बताया- बशीर बद्र से उनका रिश्ता करीब 34 साल पुराना था। 14 फरवरी 1992 से उन्होंने मुझे अपने साथ रखा। शागिर्द बनाया, लेकिन सच में बेटे की तरह रखा। भावुक होते हुए उन्होंने उनका एक शेर याद किया- मैं जागता रहा तो ग़ज़ल जागती रही, मैं सो गया तो साथ मेरे सो गई। यही शेर तुम्हारी पहचान बनेगा, डरना मत। आज उनके जाने से ग़ज़ल ही उदास हो गई- मंजर भोपाली वहीं भोपाल के वरिष्ठ शायर मंजर भोपाली ने बशीर बद्र की दूरदर्शिता और नए शायरों को आगे बढ़ाने की उनकी भूमिका को याद किया। उन्होंने एक शेर पढ़ा- कह दो अमीर-ए-आलम से हम भी शेर कहते हैं, वो सदी तुम्हारी थी, ये सदी हमारी है। मंजर भोपाली ने भावुक स्वर में कहा-आज उनके जाने से ग़ज़ल ही उदास हो गई है, ग़ज़लें उदास, शहर-ए-तमन्ना उदास है। शायरी में दर्द, मोहब्बत और ज़िंदगी की सच्चाई डॉ. बद्र की शायरी में मोहब्बत का ख़ुलूस, ज़िंदगी की तल्ख़ी, शहरी भाग-दौड़ की बेचैनी और हिंदुस्तानी मिट्टी की ख़ुशबू मिलती है। उनके शेर सड़क से लेकर संसद तक गूंजते रहे हैं। उनकी ग़ज़लों ने देश-दुनिया में लोगों के दिलों को छुआ और ज़ुबानों पर चस्पा हो गए। “कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता।” यह महज़ एक शेर नहीं, बल्कि एक एहसास है जो हर धोखा खाए दिल की आवाज़ बन गया। उनकी शायरी की तासीर देखिए- “मेरी हंसी से उदासी के फूल खिलते हैं
मैं सबके साथ हूँ, लेकिन जुदा सा लगता हूँ।” यही फ़न उन्हें सबसे अलग बनाता है। उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को आम आदमी की ज़ुबान बख़्शी, उसे नए लहजे से नवाज़ा और नए अहसास दिए। वो शेर जिसने बशीर बद्र को मक़बूल कर दिया उत्तरप्रदेश के कानपुर में 15 फरवरी 1935 को पैदा हुए बशीर बद्र ने कम उम्र में ही शायरी शुरू कर दी थी। मगर मक़बूलियत मिली इस शेर से- “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।” 1960 के दशक में इस शेर को मशहूर अदाकारा मीना कुमारी ने अपने हाथों से लिखकर एक मैगज़ीन को दिया। बस, फिर क्या था! बशीर बद्र की शोहरत का सफ़र तेज़ हो गया। सियासी हलक़ों और मुशायरों में गूंजते रहे उनके शेर उनकी शायरी महज़ हुस्न और इश्क़ तक महदूद नहीं रही। समाजी मुद्दों पर भी उन्होंने बेबाकी से लिखा। मुल्क के बँटवारे के दर्द को उन्होंने इस तरह बयान किया- “दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।” ये शेर उन्होंने शिमला समझौते के मौक़े पर पढ़ा था। फिर जब उन्हें पाकिस्तान से मुशायरे का बुलावा मिला, तो वहां भी यही शेर पढ़ा और महफ़िल में सन्नाटा छा गया। मेरठ के दंगों ने बदला उनकी ज़िंदगी का रुख़
1987 के मेरठ दंगों में उनका घर जला दिया गया। यह हादसा उनके लिए बेहद तकलीफ़देह था। इस दर्द को उन्होंने अपने अशआर में समेटा- “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।” इस हादसे के बाद उन्होंने भोपाल को अपना ठिकाना बना लिया और यहीं के होकर रह गए। शायरी का नया अंदाज़ और नए लफ़्ज़ों का इस्तेमाल
डॉ. बद्र की शायरी का सबसे ख़ास पहलू यह है कि उन्होंने ग़ज़ल को आसान लफ़्ज़ों में ढाला। उनकी शायरी न तो अरबी-फारसी के भारी-भरकम लफ़्ज़ों में जकड़ी हुई है और न ही रवायतों की ग़ुलाम। उन्होंने नए लफ़्ज़ों को ग़ज़ल में जगह दी, नए तजुर्बे किए और ग़ज़ल को एक नया आयाम दिया। “जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा।” तालीम में भी अव्वल
डॉ. बद्र का अक़ली सफ़र भी लाजवाब रहा। वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के गोल्ड मेडलिस्ट हैं। दिलचस्प बात यह रही कि जब वे वहां पढ़ने गए तो एमए के कोर्स में उनके ख़ुद के अशआर शामिल थे। शायरी से पहले पुलिस की नौकरी
क़रीब 15-16 साल की उम्र में उनके वालिद का इंतिक़ाल हो गया था। मजबूरन उन्होंने पुलिस की नौकरी ज्वॉइन कर ली। मगर शायरी से इश्क़ बरक़रार रहा। इस दौरान उन्हें तरक़्क़ी की पेशकश हुई, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया और एक यादगार शेर कह दिया- “बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
दरिया जहाँ समंदर से मिला, दरिया नहीं रहता।” बेटियों के लिए ख़ास शेर बेटियों की एहमियत को उन्होंने यूँ बयाँ किया- “वो शाख़ है न फूल, अगर तितलियाँ न हों
वो घर भी कोई घर है जहाँ बच्चियाँ न हों।” बद्र की शायरी ने उर्दू अदब को एक नया रंग दिया। उनकी ग़ज़लों में अहसास की ख़ुशबू, मोहब्बत की गर्मी और दर्द की शिद्दत एक साथ मिलती है। ओहदा पाने के बाद कई लोगों में गुरुर जाता है। वे भ्रम पाल लेते हैं। ऐसे बंदों को भी उन्होंने चेताते हुए लिखा था- “शोहरत की बुलंदी भी पलभर का तमाशा है
जिस डाल पर बैठे हो, वो टूट भी सकती है।” पत्नी के लिए कहा- गजलों के मुकम्मल होने में राहत का बड़ा हाथ बशीर की पत्नी राहत बद्र अच्छी लेखिका और शिक्षिका रही हैं। उन्होंने न केवल घर को संभाला, बल्कि उनकी साहित्यिक यात्रा में सबसे बड़ी ‘सपोर्ट सिस्टम’ के रूप में काम किया। बशीर अक्सर कहते कि उनकी शायरी की कई बारीकियों और गजलों के मुकम्मल होने में पत्नी का बहुत बड़ा हाथ रहा है। वह उनकी सबसे ईमानदार आलोचक रही हैं। उनकी शादी के बारे में कहा जाता है कि वे दोनों एक-दूसरे की शख्सियत को पूरा करते हैं। बशीर ने लगातार 60 साल तक मुशायरों में हिस्सा लिया था। वे दिन में आराम करते थे और देर रात तक मुशायरों में जाते थे। डिमेंशिया के बाद भी यही उनका रूटीन सेट हो गया था, वे रात में जागते, और दिन में सोते थे। पिछले कुछ सालों के दौरान वे अपनी गजलें सुना करते थे। कुछ तो मजबूरियां रहीं होंगी…बशीर के 10 मशहूर शेर बशीर से जुड़े 3 किस्से, मुशायरे में आधी रात नंबर आया, घंटों शायरी सुनाई फोटोज में बद्र साहब… …………………………….. यह खबर भी पढ़ें: मेरठ दंगे में बशीर बद्र का घर जला दिया था:तब कहा था- लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में मेरठ में अपना जला घर देखने के बाद ये लाइनें उर्दू गजल के शहंशाह डॉ. बशीर बद्र ने कही थीं। 1987 के मेरठ दंगों में दंगाइयों ने उनके घर को आग के हवाले कर दिया था। यह डॉ. बशीर बद्र के लिए बेहद तकलीफदेह था। दोबारा शहर लौटने पर उन्होंने शायरी के जरिए अपना दर्द बयां किया था। पढ़ें पूरी खबर…